पुनर्जन्म वैज्ञानिक है या केवल अवधारण है ?

पुर्नजन्म क्या है ? इसका वैज्ञानिक कारण क्या है।
पुर्नजन्म

विज्ञान के अनुसार कोई भी पदार्थ कभी नष्ट नहीं होता बल्कि वह किसी अन्य रूप में परिवर्तित हो जाती है। जैसे-हरे-भरे वृक्ष सैकड़ों वर्ष बाद सूख जाते हैं। तब उन्हें हम वृक्ष न कहकर 'लकड़ी' कहते हैं और वह लड़की जमीन के नीचे दबी रहती है तो सौ पचास वर्ष बाद कोयले के रूप में हो जाती हैं, कोयला जलकर राख और धुएँ में बदल जाता हैं राख उड़कर इधर-उधर चली जाती है, किन्तु नष्ट नहीं होती। विज्ञान का यह कथन आत्मा के अमर होने और पुनर्जन्म की

लोग भविष्य के लिए ज्यादा चिन्तित रहते हैं। क्या भविष्य को भाग्य के सहारे छोड़ देना चाहिए ?

सृष्टि की रचना जब से हुई, तब से लेकर आज तक मनुष्य अपने भविष्य को जानने के प्रति काफी जिज्ञासु रहा है और यह जिज्ञासा भविष्य में आने वाली सन्तानों में भी रहेगी। इसी भविष्य की जानकारी के लिए अनेक विद्याएँ भी प्रकाश में आयी जैसे-हस्त रेखा, अंक ज्योतिष, जन्म कुण्डली से भविष्य आदि। फिर भी 'भविष्य' एक अनसुल्क्षी पहेली की भांति हैं कुछ लोग कहते हैं कि भविष्य कर्म के अनुसार बनता-बिगड़ता है। इस सन्दर्भ में कृष्ण जी ने गीता के उपदेश दिया- 'कर्म प्रधान विश्व रचि राखा।' लेकिन वही भगवान कृष्ण ने जब कुन्ती से कर्म प्रधानता की व्याख्या की तब कुन्ती
ने कहा- हे केशव् मैं यह मानती हूँ कि संसार में कर्म प्रधान है। कठोर परिश्रम एवम् पुरुषार्थ से सब कुछ पाया जा सकता है किन्तु कई बार भाग्य के सामने पुरूषार्थं एवम् विद्या दोनों निष्फल हो जाते हैं। अब प्रत्यक्ष ही देख लो विद्यानों में महा विद्वान पुत्र युधिष्ठिर है। जिसे लोग धर्मराज कहते हैं महावीर भीम अर्जुन और नकुल-सहदेव जैसे पुत्रों के होते हुए दुर्योधन दुर्भाग्यवश हस्तिनापुर पर शासन कर रहा है। यह उसके भाग्य की प्रबलता ही है।

प्राणायाम क्या है ? प्राणायाम से क्या कोई लाभ होता है ?

प्राणायाम से श्वांस क्रिया का नियमन होता है। इसका सीधा अर्थ प्राणों का व्यायाम करना होता हैं। प्राणायाम करने से ही ऋषि-मुनियों ने दीर्घायु प्राप्त किया। प्राणायाम के द्वारा स्वेच्छा से मृत्यु प्राप्त करने की शक्ति प्राप्त होती है।

प्राणायाम से 'इच्छा मृत्यु' कैसे सम्भव है ?

प्राणायाम के द्वारा मनुष्य मन को नियंत्रित करके 'प्राणवायु' को पकड़ता है और छोड़ता है और इच्छानुसार प्राणों को कपाल में स्थित 'ब्रह्म रन्ध' में चढ़ाकर 'इच्छा मृत्यु' पा सकता है किन्तु इसके लिए कठिन साधना करना होता है।

कर्मफल क्या है ? क्या कर्मफल अवश्य भोगने पड़ते हैं ?

जो शुभ-अशुभ होती है। कितने लोग कहते हैं कि अमुक व्यक्ति कभी पाप नहीं किया फिर भी बेचारा दरिद्रता और अभावों से जी रहा है। शायद उसके भाग्य में दुःख ही लिखे हैं और अमुक (दूसरा कोई) को सताता है, मारता पीटता है, दूसरों का धन हड़प लेता है, झूठ-ठगी, बेईमानी सब कुछ करता है पर ऐश की जिन्दगी जी रहा है। ये सब पिछले जन्मों के कर्मफल हैं। पूर्व जन्म में जिसने जैसा भी कर्म किया होगा उसका फल उसे इस जन्म में मिल रहा है और इस जन्म के कर्मों का फल अगले जन्म में भोगना होगा।

सूर्य को अर्घ्य (जल) देने का वैज्ञानिक कारण क्या है ?

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार सूर्य को जल दिये बिना अन्न (भोजन) ग्रहण करना पाप है। अलंकारिक भाषा में वेद में कहते हैं कि सन्धया के समय सूर्य को दिये गये अर्ध्य के जलकण वज्र बनकर असुरों का नाश करते हैं। विज्ञान की दृष्टि में असुर कौन हैं ? मनुष्यों को प्रताड़ित करने वाला ये असुर कौन हैं ? ये असुर हैं-टायफाइड निमोनिया, राजयक्ष्मा आदि रोग जिनको नष्ट करने की दिव्य शक्ति सूर्य की किरणों में होता है। ऐन्थ्रेक्स के वायरस जो कई वर्षों के शुष्कीकरण से नहीं मरते वे सूर्य की किरणों से एक-डेढ़ घंटे में मर जाते हैं। हैजा, निमोनिया, चेचक आदि के कीटाणु पानी में डालकर उबालने पर नही मरते। किन्तु सूर्य की प्रातःकालीन किरणों से शीघ्र ही नष्ट हो जाते हैं। सूर्य को अर्घ्य देते समय साधक के ऊपर सूर्य की किरणें सीधी पड़ती हैं। शास्त्र अनुसार प्रातःकाल पूर्व की ओर मुख करके तथा संध्या के समय पश्चिम की ओर मुख करके जल देना चाहिए। जल के पात्र (लोटे) को छाती के बराबर ऊँचाई रखकर जल गिरायें और लोटे के उभरे भाग को तब तक देखते रहें जब तक जल न समाप्त हो जायें। ऐसा करने से आंखों में मोतियाबिन्द नहीं होता।


माला फेरने से क्या होता है ? 

माला फेरते समय अंगूठे और उगंली के मध्य घर्षण से एक प्रकार की विद्युत उत्पन्न होती है जो धमनियों द्वारा होकर सीधी जाकर 'हृदय-चक्र' को प्रभावित करती है जिससे चंचल मन स्थिर हो जाता है।

संस्कार किसे कहते है ?

शरीर एवम् वस्तुओं की शुद्धि हेतू समय-समय पर जो कर्म किये जाते हैं उन्हें 'संस्कार' कहते हैं।

गोबर से जमीन क्यों लीपा जाता है ?

गोबर में एक प्रकार की विशेष शक्ति निहित होती है जिसके सम्पर्क में आने पर टी. वी. वायरस तत्काल कट जाते हैं। वैसे तो धार्मिक दृष्टि से उस स्थान को पवित्र बनाने के लिए उस स्थान की पुताई करते हैं। वैज्ञानिक दृष्टि से भी इसका महत्व बहुत अधिक है। इटली के डॉक्टरों ने गोबर की उपयोगिता पर शोध करके टी. वी. सेनिटोरियम में रखने की सलाह देते हैं।

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